आंवलों के मौसम में नित्य प्रातः व्यायाम या भ्रमण के बाद दो पके पुष्ट हरे आंवलों को चबाकर खायें और यदि इस प्रकार कच्चा आंवला न खा सकें तो उनका रस दो चम्मच और शहद दो चम्मच मिलाकर पीएँ।जब आंवलों का मौसम न रहे तब सूखे आंवलों को कूट-पीसकर कपड़े से छानकर आंवलों का चूर्ण तीन ग्राम (एक चम्मच की मात्रा से) सोते समय रात को शहद में मिलाकर या पानी के साथ लें।इस तरह तीन-चार महिनों तक प्रतिदिन आंवलों का प्रयोग करने से भूख और पाचन-शक्ति बढ़ जाती है, गहरी नींद आने लगती है, सिरदर्द दूर हो जाता है,
मानसिक और मर्दाना शक्ति बढ़ती है, दांत मजबूत हो जाते हैं, बाल काले व चमकदार हो जाते हैं, कांति, ओज और तेजस्विता की वृद्धि होती है और मनुष्य बुढ़ापे में भी जवान बना रहता है। आंवले में रोग-निरोधक गुण होने के कारण स्वतः ही रोगों से बचाव होता है और मनुष्य सदैव निरोग रहकर लम्बी आयु प्राप्त करता है।
मानसिक और मर्दाना शक्ति बढ़ती है, दांत मजबूत हो जाते हैं, बाल काले व चमकदार हो जाते हैं, कांति, ओज और तेजस्विता की वृद्धि होती है और मनुष्य बुढ़ापे में भी जवान बना रहता है। आंवले में रोग-निरोधक गुण होने के कारण स्वतः ही रोगों से बचाव होता है और मनुष्य सदैव निरोग रहकर लम्बी आयु प्राप्त करता है।
आंवले के प्रयोग के साथ सात्विक भोजन करें। आंवला एक उच्च कोटि का रसायन है।यह रक्त में से हानिकारक और विषैले पदार्थों को निकालने और वृद्ध मनुष्यों को पुनः जवान बनाने में सक्षम है। इसके नियमित सेवन से रक्त-वाहिनियां लचकीली बनी रहती हैं और उनकी कठोरता दूर होकर रक्त का परिभ्रमण भली भाँति होने लगता है।रक्त-वाहिनियों में लचक बनी रहने के कारण मनुष्य का न तो ह्रदय फेल होता है, न ही उच्च रक्तचाप का रोग होता है और न ही रक्त का थक्का बन जाने से रुकावट के कारण मस्तिष्क की धमनियां फटने पाती हैं। आंवले के निरन्तर सेवन से रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र इन सब धातुओं से मलीन या मृत परमाणु देह के बाहर निकल जाते हैं और उनके स्थान पर नूतन और सबल परमाणुओं का प्रवेश हो जाता है।रक्त-वाहिनियां बुढ़ापे में भी लचकीली बनी रहती हैं और मनुष्य वृद्धावस्था में भी चुस्त और ताकतवर बना रहता है।
