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Monday, February 27, 2017

हिस्टीरिया और मिर्गी में अंतर


अक्सर लोग हिस्टीरिया और मिर्गी के दौरे मे अन्तर नहीं समझ पाते। मिर्गी के दौरे में रोगी को अचानक दौरा पड़ता है, रोगी कहीं पर भी रास्ते में, बस में, घर पर गिर जाता है, उसके दांत भिंच जाते हैं जिससे उसके होठ और जीभ भी दांतों मे आ जाते हैं जबकि हिस्टीरिया रोग मे ऐसा नहीं होता है रोगी को हिस्टीरिया का दौरा पड़ने से पहले ही महसूस हो जाता है और वो कोई सुरक्षित सा स्थान देखकर वहां पर लेट सकता है, उसके दांत भिचने पर होठ और जीभ दांतों के बीच मे नहीं आती। पर हाथ-पैरों का अकड़ना दोनों ही मे एक ही जैसा होता है लेकिन मिर्गी के दौरे का समय अनिश्चित नहीं होता, हिस्टीरिया में ये कम या ज़्यादा हो सकता है। हिस्टीरिया में लक्षण भी बदलते रहते हैं। हिस्टीरिया के रोगी को अमोनिया आदि सुंघाने पर दौरा खुलकर दुबारा भी आ सकता है। रोगी को दौरा आने पर ज़्यादा परेशान करना या छेड़ना ठीक नहीं है यह दौरा खुलकर दोबारा भी आ सकता है। रोगी को दौरे के समय ज़्यादा परेशान नहीं करना चाहिए। दौरा पड़ने पर रोगी के कपड़े ढीले कर देने चाहिए और उसके शरीर को हवा लगने दें। जैसे-जैसे दौरा खत्म होगा तो रोगी खुद ही धीरे-धीरे खड़ा हो जाएगा। कमज़ोरी महसूस होने पर रोगी को गर्म चाय या कॉफी पिला सकते हैं। पर ये इलाज कुछ समय के लिए ही होता है। हिस्टीरिया के रोगी को दिमाग के डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए। बहुत से लोग हिस्टीरिया के दौरे को भूत-प्रेत का मामला मानते हैं पर इसके पीछे भी दिमागी कारण अक्सर एक ही जैसे होते हैं और तान्त्रिको के द्वारा जो चिकित्सा की जाती है वो भी कुछ समय के लिए ही होती है। पर भूत-प्रेत वाली स्थिति को भी हम हिस्टीरिया रोग के मामले मे केवल अंधविश्वास या झूठ नहीं मान सकते। रोगी इन लक्षणों को देखकर कहीं से सुझाव के रूप मे अपना लेता है।

जानकारी

▶कुछ लोग सोचते हैं कि स्त्रियों के मन में यौन भावना को दबाने के कारण हिस्टीरिया रोग हो जाता है पर ये बिल्कुल ग़लत है, माना ये एक दबाव हो सकता है पर बहुत सारे दबावों में से एक। केवल यौन भावना को दबा देना हिस्टीरियां के रोगियों के लिए सही बात नहीं होगी। इसकी वजह से उन्हे ग़लत समझ लिया जाएगा जिससे उनको मानसिक तौर पर काफ़ी परेशानी सहनी पड़ती है जिसके कारण उनका रोग और भी बढ़ सकता है।

▶हिस्टीरिया रोग में रोगी के मन मे कोई दबी हुई इच्छा रह सकती है जिसे ना तो रोगी किसी को बता सकता है और ना ही मन मे दबा सकता है। अगर बच्चें को अपने मां-बाप से कोई शिकायत है तो ना तो वो अपने मां-बाप से बोलकर बात ना मनवा सकते हैं और ना ही उनसे कुछ कह सकते हैं पर वो इस बात के दबाव मे आकर हिस्टीरिया रोग के शिकार हो जाते हैं।

▶ऐसे ही एक पति-पत्नी की आपस मे बनती नहीं है तो पत्नी ना तो अपने पति को समाज के मारे छोड़ सकती है और ना ही उसे कुछ कह सकती है। इसी कारण वो मन ही मन मे कुढ़ते हुए हिस्टीरिया रोग की शिकार हो सकती है जहां बीमारी के बहाने उसका बैचेन मन एक ओर तो उसके पति से बदला लेने लगता है दूसरी ओर खुद ही उसके मन को राहत मिलने लगती है। बैचेन मन की ये दबी हुई इच्छा उसको पूरी तरह यौन सन्तुष्टि ना मिलने के कारण भी हो सकती है और इसे लेकर मन की अपराधी भावना भी कि उसे ये इच्छा सताती ही क्यों है वह तो यह चाहती ही नहीं।

▶इस तरह भविष्य मे कुछ बनना, काबिल व्यक्ति को ऊंचा उठने की लालसा, जब पूरी नहीं हो पाती तो आर्थिक सामाजिक स्थितियां या कर्त्तव्य की कोई आवाज़ उन्हे रोकती है और ऐसे व्यक्ति मानसिक रूप से इस बाधा या अभाव को स्वीकार भी नहीं कर पाते तो अवचेतन को मौक़ा मिलता है किसी दूसरे रास्ते से इस दबी इच्छा या भावना को निकालने का।

▶इस तरह रोगी को दिमागी रूप से बीमारी के दो अप्रत्यक्ष लाभ मिलते हैं एक मै बीमार हूं इसलिए मै ये काम नहीं कर सकता, यह सन्तोष प्राथमिक लाभ है तथा इस माध्यम से रोगी को अगर कुछ सहानभूति मिलने लगती है तो ये दूसरे दर्जे का लाभ है। इस लाभ को लेने बैचेन मन इस ओर चल पड़ता है और हिस्टीरिया अपने विविध लक्षणों और रूपों मे प्रकट होने लगता है। भूत आते हो, देवता आते हो, या बेहोशी के साधारण दौरे पड़ते हैं इसलिए शरीर के किसी ख़ास अंग मे अगर कोई कमज़ोरी महसूस होती है, रोगी अपनी पहले की कमज़ोरी से, पहले की कल्पना से, जोड़कर और किसी को देखकर अवचेतन रूप से सुझाव ग्रहण कर वैसे ही करने लगता है। जैसे आंख अगर पहले कमज़ोर है और रोगी को इसका अहसास है तभी वो आंख से ना दिखाई देने का सुझाव ग्रहण करेगा और तब सचमुच उसे अंधेपन का एहसास होगा। इसी तरह मन की कमज़ोरी रहने पर किसी तरह के मानसिक आघात से बोलने या हाथ-पैर हिलाने की ताकत कुछ समय के लिए रूक सकती है। अगर शरीर के ऐसे लक्षणों के कारण जांच मे नहीं मिलते तो उसे हिस्टीरिया रोग कहते हैं। ये स्थिति कुछ समय के लिए ही होती है। पर अगर समय रहते इलाज ना किया जाए तो ये कंपन, लकवा जैसे लक्षण कभी-कभी हमेशा के लक्षणों मे बदल सकते हैं। इसलिए इस रोग का इलाज करवाने के बाद रोगी को दिमागी डॉक्टर की देखरेख में पूरा इलाज करवाना चाहिए।