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Sunday, March 05, 2017

पाचक पित्त


पाचक पित्तः-पाचक पित्त पंचअग्नियों (पाचक ग्रन्थियों) से निकलने वाले रसों का सम्मिश्रित रूप है। इसमें अग्नि तत्व की प्रधानता पायी जाती है। ये पाँच रस इस प्रकार हैः-
  • लार ग्रन्थियों से बनने वाला लार रस। 
  • आमाशय में बनने वाला आमाशीय रस।
  • अग्नाशय का स्त्राव।
  • पित्ताशय से बनने वाला पित्त रस।
  • आन्त्र रस। 
पाचक पित्त पक्कवाशय और आमाशय के बीच रहता है। इसका मुख्य कार्य भोजन में मिलकर उसका शोषण करना है। यह भोजन को पचा कर पाचक रस व मल को अलग-अलग करता है। 

यह पक्कवाशय में रहते हुए दूसरे पाचक रसों को शक्ति देता है। शरीर को गर्म रखना भी इसका मुख्य कार्य है। जब पाचक पित्त शरीर में कुपित होता है तो शरीर में नीचे लिखे रोग हो सकते हैः-
  • जठराग्नि का मन्द होना
  • दस्त लगना
  • खूनी पेचिश
  • कब्ज बनना
  • मधुमेह 
  • मोटापा
  • अम्लपित्त
  • अल्सर
  • शरीर में कैलस्ट्रोल का अधिक बनना
  • हृदय रोग
पाचक पित्त को नियन्त्रण करने के लिए नीचे लिखी क्रियाओं का साधक का अभ्यास करना होगा। यदि शरीर में पाचक पित्त सम अवस्था मे बनता है तो हमारा पाचन सुदृढ़ रहता है। जब शरीर में पाचन और निष्कासन क्रियाएं ठीक होती हैं तो हम ऊपर दिए गए रोगों से बच सकते हैं। इस पित्त को सन्तुलित करने के लिए नीचे दी गई क्रियाएं सहायक होंगीः- 

शुद्धि क्रियाएंः  कुंजल, शंख प्रक्षालन (नोटः-हृदय रोगियों के लिए निषेध है)

आसनः त्रिकोणासन, जानुशिरासन, कोणासन, सर्पासन, पादोतानासन,अर्धमत्स्येन्द्रासन, शवासन। 

प्राणायामः अग्निसार, शीतली, चन्द्रभेदी, उड्डियान बन्ध व बाह्य कुम्भक का अभ्यास। 

भोजनः सुपाच्य भोजन, सलाद, हरी सब्जियाँ तथा ताजे फलों का सेवन भी पाचक पित्त को सम अवस्था में रखने में सहायक है।