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Tuesday, March 07, 2017

साधक पित्त


यह पित्त हृदय में रहता है। बुद्धि को तेज करता है प्रतिभा का निर्माण करता है। उत्साह एवं आनन्द की अनुभूति करवाता है। आध्यात्मिक शक्ति देता है। सात्विक वृत्ति का निर्माण करता है। ईष्र्या, द्वेष व स्वार्थ की भावना को समाप्त करता है। साधक पित्त के कुपित होने पर स्नायु तन्त्र तथा मानसिक रोग होने लगते हैं जैसे किः-
  • नीरसता
  • माईग्रेन
  • मूर्छा
  • अधरंग
  • अनिद्रा
  • उच्च व निम्न रक्तचाप
  • हृदय रोग
  • अवसाद
नीचे लिखी क्रियाओं के अभ्यास से साधक पित्त सन्तुलित रहता है। 

शुद्धि क्रियाएंः सूत्र नेति, जल नेति, कुंजल आदि। 

आसनः सूर्य नमस्कार पहली व बारवीं स्थिति, शशांक आसन, शवासन, योग निद्रा। 

प्राणायामः अनुलोम-विलोम,  भ्रामरी व नाड़ी शोधन, उज्जायी प्राणायाम, ध्यान 

अन्य सुझावः आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ना, महापुरुषों के प्रवचन सुनना, आत्म-चिन्तन करना तथा लोकहित के कार्य करना।